दोस्त की मा सरला आंटी की चुदाई

हेलो दोस्तो, मैं हर्ष पाटिल, एक बार फिर से हाजिर हूँ एक नयी कहानी लेकर. सभी को पहले धन्यवाद कहता हूँ. जिन्होने मेरी स्टोरीस पढ़ी और लीके किया.

जो नये रीडर्स है उन्हे अपना परिचय देता हूँ. मेरा नाम हर्ष है. मेरी आगे 27 है. मैं नवी मुंबई मे रहता हूँ.

आज जो कहानी मैं सुनने जर आहा हूँ. वो मेरे और मेरे दोस्त के मा के बारे मे है. मेरा एक दोस्त है जिसका नाम सुधीर है. हम दोनो बचपन से ही एक दूसरे को जानते है. और हुमारी फॅमिली भी एकदुसरे को अच्छी तरह से जानती.

सुधीर के घर मे उसकी मा जिनका नाम सरला है. उनकी आगे करीब 40 के आस पास होगी. उसके पिताजी प्रमोद जी उनकी आगे 52 यियर्ज़ है. और सुधीर बस 3 जान ही है.

हम दोनो का कलाज ख़तम होने के बाद मूज़े हुमारे इधर ही जॉब मिल गयी लेकिन सुधीर को पुणे मे अच्छा जॉब मिल गया तो वाउ आहा चला गया. उसके वाहा जाने के बाद मेरा उनके घर आना जाना बोहोट कम होगआया था.

उसके बाद एक दो साल यूहनी गुजर गये जबही सुधीर आता था तब मैं उसके घर जाता था. उसके मा और पिताजी मेरी शिकायत उससे करते थे के ये तो बस जब तू आता है तभी घर आता उसके बाद पता नही किधर गायब हो जाता है. मैं भी बस हास के ताल देता था.

एक दिन अचानक से सुधीर के पिताजी को हार्ट अटॅक आया और उसी मे उनका देहांत हो गया. फिर आंटी अकेली हो गयी. सुधीर ने उन्हे अपने साथ चलने को कहा लेकिन वो मानी नही.

फिर उसने मुज़ासे कहा.

सुधीर : प्लीज़ तू मा का ख़याल रख अब मैं नही रहूँगा फिर भी तू घर आके उनके हाल चल पूछा कर.

मैं: अरे भाई ये भी कोई बताने वाली बात है. तू बेज़ीज़क जा और अपना कम कर. मैं आते रहूँगा और आंटी का ख्याल भी रखूँगा.

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उसके बाद कुछ दिन यूँही निकल गये मैं आंटी के घर दिन दो दिन मे उन्हे मिलने जया करने लगा. अब वो तोड़ा ठीक महसूस कर रही थी. लेकिन फिर भी मूज़े लगता था वो थोड़ी परेशन ज़रूर है.

एक दिन मैने ऑफ. से छुट्टी ली थी मेरे पर्सनल कम के लिए. और डोपेहर को मैं फ्री हो गया था. तो सोचा चलो आंटी को मिलके आते है.
डोपेहर के 4 बजे थे मैं सुधीर के घर पे आगेया. तब मैने दरवाजा खटखटाया लेकिन आंटी ने खोला नही तोड़ा पुश करते ही वो खुल गया. अब वो था तो अपनो घर इसीलिए मैं भी अंदर चला गया.

जैसे ही मैं अंदर आया किसी के सुबकने की आवाज़ आने लगी साथ ही सिसकारियोयन की. अब मेरा दिमाग़ घूम गया. मूज़े लगा आंटी किसी और के सात हॅंडर है.

फिर मैं चुपके से उनके बेडरूम मे देखने गया. वो भी दरवाजा खुला था. और मैने अंदर धीरे से झाँक के देखा.

ऑश तेरी आंटी ने निघट्य पहना हुआ था और वो उनके गले तक उपर उठा हुआ था. उनके हाथ मे कुछ था जिसे वो अपनी चूत पर घुमा रही थी. और एक हाथ से अपने बूब्स दबा रही थी. और बीच बीच मे कह रही थी.

आंटी: आहह सुधीर के पापा क्यूँ छोड़ गये मूज़े ऐसे प्यासा. आअहह अब ये आग कौन बुज़ाएगा.. आहह.

मैं तो हैरान रह गया देख कर. तब मैं सोचा यहा ज़्यादा रुकना ठीक नही है. मैं वाहा से फ़ौरन अपने घर आगेया और उन्हे याद करके मूठ मारी. उसी दिन से मेरा आंटी के तरफ देखने का नज़रिया बदल गया.

अब मैं दिन रत यही सोचता था के कैसे आंटी को पटौ. हलकी ये मेरे लिए ज़्यादा मुश्किल नही था.

फिर दो दिन बाद मैं फिर से शाम को आंटी के घर गया. आंटी तभी खाना बना रही थी.

आंटी: अरे हर्ष बेटा कैसे हो.

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मैं: ठीक हूँ आंटी आप कैसे हो. बाकी सब कैसे चल रहा है.

आंटी: बाकी बस ठीक चल रहा है. तुम रूको मैं तुम्हारे लिए छाई बनके लाती हूँ.

फिर आंटी किचन मे छाई बनाना चली गयी. मैं उनके पीछे पीछे चला गया. और किचन के डोर मे खड़ा रह कर उनसे बात करते करते उन्हे निहार रहा था.

उनका फिगर सच मे कमाल का था 36-34-38. अब मेरी नज़रे बार बार उनके मुममे और गंद की तरफ ही जाती थी.

फिर छाई बन गयी और हम दोनो हॉल मे आगाय. और बातें करने लगे.

मैं: सुधीर का फोन आता है के नही आंटी?

आंटी: हा आता है. दो टीन दिन मे एक बार उससे बात होती रहती है. तुम्हारे घर मे कैसे है सब.

मैं: ठीक है आंटी सब. आपको अकेले यहा अभी बोर नही होता.

आंटी: होता तो है बेटा पर क्या कर सकती हूँ. तुम्हारे अंकल थे तब कही ना कही घूमने जाते थे.

ये बात कहकर वो तोड़ा एमोशनल हो गयी. और उनके आँखो मे पानी आगेया. तब मैं तोड़ा उनके करीब गया और कहने लगा.

मैं: अरे आंटी अब आप वापस पुरानी यादों मे मत रहा करो आपको ही तकलीफ़ होगी उससे.

आंटी: और कर भी क्या सकती हूँ बेटा तब सुधीर के पापा थे तब सब ठीक था अब कौन है मेरा. बेटा भी दूर है.

मैं: अरे आप ऐसा क्यूँ कह रही हो मैं हूँ ना. आपके लिए यहाँ. मैं ले जौंगा आपको कही घूमने फिरने.

और मैने उन्हे बैठे बैठे अपनी बाहों मे ले लिया. वो भी मेरी खण्डो पर सर रख कर सूबक रही थी. और मैं अब उनकी पीठ सहला रहा था.

मूज़े उनपर सच मे प्यार आ रहा था. मान कर रहा था अभी के अभी आंटी को चूम लूँ और प्यार करूँ. लेकिन कहीं दर भी था. इसीलिए मैने सोचा उन्हे तोड़ा टाइम दूं.

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